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Kahani Dashrath manjhi (mountain man) ki

dashrath manji ne WO kam kiya hai

jiski kahani ek ma apne bacho ko apne PARISHRAM ki shiksha dene ke liye sunati hai

dashrath manjhi ka parichay  Hindi me

जन्म.                    1934
                      गहलौर, बिहार, भारत

मृत्यु.                 17 अगस्त 2007
                          नयी दिल्ली, भारत

मृत्यु का कारण.      पित्ताशय कैंसर

राष्ट्रीयता.                     भारतीय indian

अन्य नाम.                  माउंटेन मैन

प्रसिद्धि कारण.(famous for).        अकेले ही पहाड़                                                                    को काटकर सड़क का निर्माण किया।

जीवनसाथी(wife).  फाल्गुनी देवी

dashrath manjhi ne akele hi pahadi katkar WO rasta banaya
ki

Jo pahle 80 kilometer ka thaa WO ab sirf 13 kilometer ka rah gaya hai

jab unki patni pahadi se giri to  WO unhe bacha nahi sake

kyuki aspatal waha se 80 kilometre dur thaa aur na hi koi
asa sadhan thaa jisse WO wah jaldi pahuch sake

apni patni ko khokar unhone apni jindagi ka Sara samay Sirf pahadi par rasta banane ko diya

unhone apni bakriyo ko bech   kar
mile paiso se chaini aur hathora jaise auojaar kharide
aur apne kaam me lag gaye

gau walo ne unko

dukh se bhara ek pagal insan
samajha.
Jo apna mansik santulan kho chuka hai

par manjhi ne bhi अकेले ही 360 फुट लंबी 30 फुट चौड़ी और 25 फुट ऊँचे पहाड़ को काट के एक सड़क bana डाली।

lagbhag 22 वर्षों परिश्रम के बाद hi unka ye kaam safal hua

दशरथ मांझी का देहांत 18 अगस्त 2007 को कैंसर की बीमारी से लड़ते हुए दिल्ली के AIIMS अस्पताल में हुआ.इनका अंतिम संस्कार बिहार सरकार द्वारा राजकीय सम्मानके साथ किया गया.

unki kahani hume prerana deti hai ki
rasta jahe jaisa bhi ho jitne bhi mushkil kyu na ho par agar humari koshish sache dil se ki gayi ho hume hamari
manjil milegi
jarur milegi

“”दशरथ मांझी का वक्तव्यफिल्म: 'मांझी: द माउंटेन मैन में'

...अपने बुलंद हौसलों और खुद को जो कुछ आता था, उसी के दम पर मैं मेहनत करता रहा. संघर्ष के दिनों में मेरी मां कहा करती थीं कि 12 साल में तो घूरे के भी दिन फिर जाते हैं. उनका यही मंत्र था कि अपनी धुन में लगे रहो. बस, मैंने भी यही मंत्र जीवन में बांध रखा था कि अपना काम करते रहो, चीजें मिलें, न मिलें इसकी परवाह मत करो. हर रात के बाद दिन तो आता ही है.

un manjhi ko mera shat shat naman

DUDH KA GILAS ( ache karmo ka fal )

एक बार एक लड़का
अपने स्कूल की फीस भरने के लिए
एक दरवाजे से
दूसरे दरवाजे तक
कुछ सामान बेचा करता था,

एक दिन उसका
कोई सामान नहीं बिका
और उसे बड़े जोर से
भूख भी लग रही थी.
उसने तय किया कि
अब वह जिस भी दरवाजे पर जायेगा,
उससे खाना मांग लेगा...

पहला दरवाजा खटखटाते ही
एक लड़की ने दरवाजा खोला,
जिसे देखकर वह घबरा गया
और बजाय खाने के उसने
पानी का एक गिलास माँगा....

लड़की ने भांप लिया था कि
वह भूखा है, इसलिए वह
एक.. बड़ा गिलास दूध का ले आई.
लड़के ने धीरे-धीरे दूध पी लिया...

" कितने पैसे दूं ?"
लड़के ने पूछा.
" पैसे किस बात के ?"
लड़की ने जवाव में कहा.
"माँ ने मुझे सिखाया है कि
जब भी किसी पर दया करो तो
उसके पैसे नहीं लेने चाहिए."

"तो फिर मैं आपको
दिल से धन्यवाद देता हूँ."
जैसे ही उस लड़के ने वह घर छोड़ा,
उसे न केवल शारीरिक तौर पर
शक्ति भी मिल चुकी थी ,
बल्कि उसका भगवान् और
आदमी पर भरोसा और भी बढ़ गया था

सालों बाद वह लड़की
गंभीर रूप से बीमार पड़ गयी.
लोकल डॉक्टर ने उसे
शहर के बड़े अस्पताल में
इलाज के लिए भेज दिया...

विशेषज्ञ डॉक्टर होवार्ड केल्ली को मरीज देखने के लिए बुलाया गया.
जैसे ही उसने लड़की के
कस्बे का नाम सुना,
उसकी आँखों में चमक आ गयी...

वह एकदम सीट से उठा
और उस लड़की के कमरे में गया.
उसने उस लड़की को देखा,
एकदम पहचान लिया और
तय कर लिया कि वह
उसकी जान बचाने के लिए
जमीन-आसमान एक कर देगा....

उसकी मेहनत और लग्न रंग लायी
और उस लड़की कि जान बच गयी.
डॉक्टर ने अस्पताल के
ऑफिस में जा कर उस
लड़की के इलाज का बिल लिया....

उस बिल के कौने में
एक नोट लिखा और
उसे उस लड़की के पास
भिजवा दिया.
लड़की बिल का
लिफाफा देखकर घबरागयी...

उसे मालूम था कि
वह बीमारी से तो वह बच गयी है
लेकिन बिल कि रकम
जरूर उसकी जान ले लेगी...

फिर भी उसने धीरे से बिल खोला,
रकम को देखा और फिर
अचानक उसकी नज़र बिल के
कौने में पैन से लिखे नोट पर गयी...

जहाँ लिखा था,
"एक गिलास दूध द्वारा इस बिल का भुगतान किया जा चुका है.
" नीचे उस नेक डॉक्टर
होवार्ड केल्ली के हस्ताक्षर थे.

ख़ुशी और अचम्भे से
उस लड़की के गालों पर आंसू टपक पड़े
उसने ऊपर कि और दोनों हाथ उठा कर
कहा, " हे भगवान..!
आपका बहुत-बहुत धन्यवाद..
आपका प्यार इंसानों के
दिलों और हाथों के द्वारा
न जाने कहाँ- कहाँ फैल चुका है."

अगर आप दूसरों पर..
अच्छाई करोगे तो..
आपके साथ भी.. अच्छा ही होगा ..!!


MAHARAJA JAY SINGH KI WO KAHANI JISE PADHKAR AAP GARV KARENGE


इंगलैण्ड की राजधानी लंदन में यात्रा के दौरान एक शाम महाराजा जयसिंह सादे कपड़ों में बॉन्ड स्ट्रीट में घूमने के लिए निकले
और वहां उन्होने रोल्स रॉयस कम्पनी का भव्य शो रूम देखा और मोटर कार का भाव जानने के लिए अंदर चले गए।
शॉ रूम के अंग्रेज मैनेजर ने उन्हें “कंगाल भारत” का सामान्य नागरिक समझ कर वापस भेज दिया।
शोरूम के सेल्समैन ने भी उन्हें बहुत अपमानित किया, बस उन्हें “गेट आऊट” कहने के अलावा अपमान करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।अपमानित महाराजा जयसिंह वापस होटल पर आए और रोल्स रॉयस के उसी शोरूम पर फोन लगवाया और संदेशा कहलवाया कि अलवर के महाराजा कुछ मोटर कार खरीदने चाहते हैं।

 कुछ देर बाद जब महाराजा रजवाड़ी पोशाक में और अपने पूरे दबदबे के साथ शोरूम पर पहुंचे तब तक शोरूम में उनके स्वागत में “रेड कार्पेट” बिछ चुका था।
वही अंग्रेज मैनेजर और सेल्समेन्स उनके सामने नतमस्तक खड़े थे।
महाराजा ने उस समय शोरूम में पड़ी सभी छ: कारों को खरीदकर, कारों की कीमत के साथ उन्हें भारत पहुँचाने के खर्च का भुगतान कर दिया।

 भारत पहुँच कर महाराजा जयसिंह ने सभी छ: कारों को अलवर नगरपालिका को दे दी और आदेश दिया कि हर कार का उपयोग (उस समय के दौरान 8320 वर्ग कि.मी) अलवर राज्य में कचरा उठाने के लिए किया जाए।

 विश्‍व की अव्वल नंबर मानी जाने वाली सुपर क्लास रोल्स रॉयस कार नगरपालिका के लिए कचरागाड़ी के रूप में उपयोग लिए जाने के समाचार पूरी दुनिया में फैल गया और रोल्स रॉयस की इज्जत तार-तार हुई। युरोप-अमरीका में कोई अमीर व्यक्‍ति अगर ये कहता “मेरे पास रोल्स रॉयस कार” है तो सामने वाला पूछता “कौनसी?” वही जो भारत में कचरा उठाने के काम आती है! वही?
बदनामी के कारण और कारों की बिक्री में एकदम कमी आने से रोल्स रॉयस कम्पनी के मालिकों को बहुत नुकसान होने लगा। महाराज जयसिंह को उन्होने क्षमा मांगते हुए टेलिग्राम भेजे और अनुरोध किया कि रोल्स रॉयस कारों से कचरा उठवाना बन्द करवावें।
माफी पत्र लिखने के साथ ही छ: और मोटर कार बिना मूल्य देने के लिए भी तैयार हो गए।
 महाराजा जयसिंह जी को जब पक्‍का विश्‍वास हो गया कि अंग्रेजों को वाजिब बोधपाठ मिल गया है
तो महाराजा ने उन कारों से कचरा उठवाना बन्द करवाया !                
 है।

Ye kahani apke jine ka tarika badal dega

Ye kahani apke jine ka tarika badal dega

*ये कहानी आपके जीने की सोच बदल देगी!*

एक दिन एक किसान का बैल कुएँ में गिर गया।

वह बैल घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं।

अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि बैल काफी बूढा हो चूका था अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था और इसलिए उसे कुएँ में ही दफना देना चाहिऐ।। 

किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी।
जैसे ही बैल कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़ चीख़ कर रोने लगा और फिर ,अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया। 

सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया..

अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह बैल एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था। 

जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे -वैसे वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को गिरा देता और एक सीढी ऊपर चढ़ आता जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह बैल कुएँ के किनारे पर पहुंच गया
और फिर कूदकर बाहर भाग गया ।  

ध्यान रखे आपके जीवन में भी बहुत तरह से मिट्टी फेंकी जायेगी बहुत तरह की गंदगी आप पर गिरेगी जैसे कि , 
आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही आपकी आलोचना करेगा
कोई आपकी सफलता से ईर्ष्या के कारण आपको बेकार में ही भला बुरा कहेगा  
कोई आपसे आगे निकलने के लिए ऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो आपके आदर्शों के विरुद्ध होंगे...

ऐसे में आपको हतोत्साहित हो कर कुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हर तरह की गंदगी को गिरा देना है और उससे सीख ले कर उसे सीढ़ी बनाकर बिना अपने आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है।

सकारात्मक रहे..
सकारात्मक जिए!
इस संसार में....

      सबसे बड़ी सम्पत्ति *"बुद्धि "*
      सबसे अच्छा हथियार *"धैर्य"*
      सबसे अच्छी सुरक्षा *"विश्वास"*
      सबसे बढ़िया दवा *"हँसी"* है

और आश्चर्य की बात कि *"ये सब निशुल्क हैं

सदा मुस्कुराते रहें। सदा आगे बढ़ते रहें!

Nagendra chaudhary

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Ghas aur baas ki motivational kahani

*घास और  बाँस* 
*Motivational story !*

ये कहानी एक ऐसे व्यक्ति की है जो एक Busniss man था लेकिन उसका business डूब गया और वो पूरी तरह hopeless हो गया। अपनी life से बुरी तरह थक चुका था। अपनी life से frustrate चुका था।

एक दिन परेशान होकर वो जंगल में गया और जंगल में काफी देर अकेले बैठा रहा। कुछ सोचकर भगवान से बोला – मैं हार चुका हूँ, मुझे कोई एक वजह बताइये कि मैं क्यों ना हताश होऊं, मेरा सब कुछ खत्म हो चुका है।

मैं क्यों ना frustrate होऊं?

*Please help me *God*……………………..

*भगवान का जवाब/ Answer of God :*

तुम जंगल में इस घास और बांस के पेड़ को देखो- जब मैंने घास और इस बांस के बीज को लगाया। मैंने इन दोनों की ही बहुत अच्छे से देखभाल की। इनको बराबर पानी दिया, बराबर Light दी।

घास बहुत जल्दी बड़ी होने लगी और इसने धरती को हरा भरा कर दिया लेकिन बांस का बीज बड़ा नहीं हुआ। लेकिन मैंने बांस के लिए अपनी हिम्मत नहीं हारी।

दूसरी साल, घास और घनी हो गयी उसपर झाड़ियाँ भी आने लगी लेकिन बांस के बीज में कोई growth नहीं हुई। लेकिन मैंने फिर भी बांस के बीज के लिए हिम्मत नहीं हारी।

तीसरी साल भी बांस के बीज में कोई वृद्धि नहीं हुई, लेकिन मित्र मैंने फिर भी हिम्मत नहीं हारी।

चौथे साल भी बांस के बीज में कोई growth नहीं हुई लेकिन मैं फिर भी लगा रहा।

पांच साल बाद, उस बांस के बीज से एक छोटा सा पौधा अंकुरित हुआ……….. घास की तुलना में ये बहुत छोटा था और कमजोर था लेकिन केवल 6 महीने बाद ये छोटा सा पौधा 100 फ़ीट लम्बा हो गया।
मैंने इस बांस की जड़ को grow करने के लिए पांच साल का समय लगाया। इन पांच सालों में इसकी जड़ इतनी मजबूत हो गयी कि 100 फिट से ऊँचे बांस को संभाल सके।

जब भी तुम्हें life में struggle करना पड़े तो समझिए कि आपकी जड़ मजबूत हो रही है। आपका संघर्ष आपको मजबूत बना रहा है जिससे कि आप आने वाले  कल को सबसे बेहतरीन बना सको।

मैंने बांस पर हार नहीं मानी,
मैंने तुम पर भी हार नहीं मानूंगा,
किसी दूसरे से अपनी तुलना(comparison) मत करो
घास और बांस दोनों के बड़े होने का time अलग अलग है दोनों का उद्देश्य अलग अलग है।

तुम्हारा भी समय आएगा। तुम भी एक दिन बांस के पेड़ की तरह आसमान छुओगे। मैंने हिम्मत नहीं हारी, तुम भी मत हारो ! ……………………..

अपनी life में struggle से मत घबराओ...

रजनीश कुमार

Shree Krishna ke shish par kyu laga hota he mor pankh

मोर पंख की कथा
एक समय गोकुल में एक मोर रहता था
वह रोज़ जब कृष्ण भगवान आते और जाते तो उनके द्वार पर बैठा एक ही भजन गाता
"मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे
गोपाल सांवरिया मेरे
माँ बाप सांवरिया मेरे"
वो इस तरहा रोज़ यही गुनगुनाता रहता
एक दिन हो गया 2 दिन हो गये
इसी तरहा 1 साल व्यतीत हो गया
परन्तु कृष्ण ने एक ना सुनी
तब वहा से एक मैना उडती जा रही थी
उसने मोर को रोता हुआ देखा और अचम्भा किया
उसे मोर के रोने पर अचम्भा नही हुआ ,उसे ये देख के अचम्भा हुआ की कृष्ण के दर पर कोई रो रहा है

वो मोर से बोली
मैना: हे मोर तू क्यों रोता हैं
तो मोर ने बताया की
मोर :पिछले एक साल से में इस छलिये को रिझा रहा हु परन्तु इसने आज तक मुझे पानी भी नही पिलाया

ये सुन मैना बोली
मैना: में बरसना से आई हु
तू भी वहा चल
और वो दोनों उड़ चले और उड़ते उड़ते बरसाने पहुच गये
जब मैना वहा पहुची तो उसने गाना शुरू किया
श्री राधे राधे राधे बरसाने वाली राधे
परन्तु मोर तो बरसाने में आकर भी यही दोहरा रहा था
मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे
गोपाल सांवरिया मेरे
माँ बाप सांवरिया मेरे"
जब राधा ने ये सुना तो वो दोड़ी चली आई और मोर को गले लगा लिया
राधा: तू कहा से आया हैं
तो मोर ने बोला
मोर: जय हो राधा रानी आज तक सुना था की तू करुणामयी हो और आज साबित हो गया
राधा: वो कैसे
मोर: में पिछले 1 साल से श्याम नाम की बिन बजा रहा हु और उसने पानी भी नही पिलाया
राधा: ठीक हैं अब तुम गोकुल जाओ और यही रटो
जय राधे राधे राधे
बरसाने वाली राधे
मोर फिर गोकुल आता हैं और
गाता हैंजय राधे राधे....
जब कृष्ण ने ये सुना तो भागते हुए आये और बोले
कृष्ण : हे मोर तू कहा से आया हैं
मोर: वाह छलिये जब एक साल से तेरे नाम की बिन बजा रहा था तो पानी भी नही पूछा और जब आज party बदली तो भागता हुआ आगया
कृष्ण: अरे बातो में मत उलझा बात बता
मोर: में पिछले एक साल से तेरे द्वार पर यही गा रहा हु
मेरा कोई ना सहारा बिना तेरे
गोपाल सांवरिया मेरे
माँ बाप सांवरिया मेरे"
कृष्ण : तूने राधा का नाम लिया ये तेरा वरदान हैं
और मेने पानी नही पूछा ये मेरे लिए श्राप हैं
इसलिए जब तक ये स्रष्टि रहेगी तेरा पंख सदेव मेरे शीश पर विराजमान होगा
और जो राधा का नाम लेगा वो भी मेरे शीश पर रहेगा
जय हो मोर मुकुट बंशी वाले की

राधे राधे

Ahankar ka tyag hi bhakti he

Ahankar ka tyag hi bhakti he

यमराज ने डाकू को साधु की सेवा करने को कहा
++++++++++++++++++++++++++
एक साधु व डाकू यमलोक पहुंचे। डाकू ने यमराज से दंड मांगा और साधु ने स्वर्ग की सुख-सुविधाएं। यमराज ने डाकू को साधु की सेवा करने का दंड दिया। साधु तैयार नहीं हुआ। यम ने साधु से कहा- तुम्हारा तप अभी अधूरा है।मृत्यु के बाद एक साधु और एक डाकू साथ-साथ यमराज के दरबार में पहुंचे। यमराज ने अपने बहीखातों में देखा और दोनों से कहा-यदि तुम दोनों अपने बारे में कुछ कहना चाहते हो तो कह सकते हो। डाकू अत्यंत विनम्र शब्दों में बोला- महाराज! मैंने जीवनभर पाप कर्म किए हैं।मैं बहुत बड़ा अपराधी हूं। अत: आप जो दंड मेरे लिए तय करेंगे, मुझे स्वीकार होगा। डाकू के चुप होते ही साधु बोला- महाराज! मैंने आजीवन तपस्या और भक्ति की है। मैं कभी असत्य के मार्ग पर नहीं चला। मैंने सदैव सत्कर्म ही किए हैं इसलिए आप कृपा कर मेरे लिए स्वर्ग के सुख-साधनों का प्रबंध करें।यमराज ने दोनों की इच्छा सुनी और डाकू से कहा- तुम्हें दंड दिया जाता है कि तुम आज से इस साधु की सेवा करो। डाकू ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार कर ली। यमराज की यह आज्ञा सुनकर साधु ने आपत्ति करते हुए कहा- महाराज! इस पापी के स्पर्श से मैं अपवित्र हो जाऊंगा। मेरी तपस्या तथा भक्ति का पुण्य निर्थक हो जाएगा।यह सुनकर यमराज क्रोधित होते हुए बोले- निरपराध और भोले व्यक्तियों को लूटने और हत्या करने वाला तो इतना विनम्र हो गया कि तुम्हारी सेवा करने को तैयार है और एक तुम हो कि वर्षो की तपस्याके बाद भी अहंकारग्रस्त ही रहे और यह न जान सके कि सबमें एक ही आत्मतत्व समाया हुआ है। तुम्हारीतपस्या अधूरी है। अत: आज से तुम इस डाकू की सेवा करो।कथा का संदेश यह है कि शास्त्र विरुद्ध की गयी भक्ति का फल ऐसा ही होता है। वस्तुत: अहंकार का त्याग ही भक्ति का मूलमंत्र है और यही भविष्य में परमेश्वर उपलब्धि का आधार बनता है।

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